क्या रेल मंत्रालय का वजन सीमा तय करने का निर्णय, राजनीतिक आत्मघात होगा?

रेल मंत्रालय द्वारा निर्णय लिया गया है कि आगे से हवाई यात्रा की तरह रेल यात्रियों पर भी सामान ले जाने की सीमाएं रहेंगी। सामान्य वर्ग के लिए 35 किलो, AC तृतीय के लिए 40, AC द्वितीय के लिए 50 और AC प्रथम श्रेणी के लिए 70 किलो की सीमा तय की गई है। साथ ही सामान के आकार पर भी सीमा तय की गई है। 100x60x25 सेंटी मीटर से बड़ा बैग ले जाना प्रतिबंधित होगा!

प्रथम दृष्टया ये निर्णय बचकाने नजर आ रहे हैं। हवाई यात्रा की तुलना में रेल यात्रा में इन्हें लागू करना लगभग असम्भव है। निम्न कुछ बिंदुओं पर रेलवे ने क्या सोचा है यह देखने की उत्सुकता रहेगी..

  • देश के सैकड़ों स्टेशनों पर ये सुविधाएं जुटाना अत्यन्त खर्चीला साबित होगा। रेलवे सेवा के वृहद आकार की वजह से सामान्यतः योजनाएं चरणबद्ध लागू होती है। क्या रेलवे इस योजना को सभी स्टेशनों पर एक साथ लागू कर पाएगी? यदि नहीं तो, फिर दिल्ली वाले यात्री पर सीमा लागू होगी और रीवा वाले पर नहीं, जैसी स्थितियों से कैसे निपटा जाएगा? 
  • बड़े स्टेशनों पर एक ही समय में हजारों (एक रेल में करीब 1500 सवारियां होती है) यात्री रेल में सवार होने आते हैं। वहां यदि सामान का वजन करने और आकार नापने जैसी प्रक्रियाएं लागू की गई तो उससे उत्पन्न अव्यवस्था की कल्पना भी करना मुश्किल है। 
  • हवाई अड्डों पर सुरक्षा व्यवस्था CISF जैसी उच्च प्रशिक्षित संस्था के हवाले रहती है। इसलिए प्रवेश द्वार के अतिरिक्त कहीं और से प्रवेश आदि संभव नहीं रहता। रेलवे स्टेशन पर यह संभव नहीं है। खास तौर पर छोटे स्टेशनों पर ट्रेन की लंबाई प्लेटफॉर्म से कहीं ज्यादा होती है और लोग मनमाने स्थानों से ट्रेन में सवार होते रहते हैं। 
  • बड़े और मध्यम स्तर के स्टेशनों पर इस वजह से घंटों कतारों में खड़ा रहना पड़ेगा। यह अपने आप में परेशानी का बड़ा सबब बनेगा। 
  • यदि रेलवे इस आग्रह को बढ़ाती है कि निश्चित आकार और वजन से ऊपर का सामान ट्रेन से जुड़े लगेज कोच में रखा जाना चाहिए तो इसके लिए रेलवे को भी हवाई अड्डों जैसी लगेज बुक करना, उसे उसी ट्रेन के लगेज कोच में लादना और वांछित स्टेशन पर पुनः कुछ ही मिनटों में उसे यात्री को सुपर्द करना आदि सुविधाएं जुटाना होंगी। चूंकि ट्रेन कईं स्टेशनों पर रुकती है, ऐसे में इन व्यवस्थाओं को लागू करना बहुत बड़ी चुनौती रहेगी। 
  • निश्चय ही इन समस्याओं का एक हल चलित दस्ते हैं। ये दस्ते चलती ट्रेन में सामान की तफ्तीश कर,आ के शुल्क वसूली कर सकते हैं। परन्तु इस प्रकार के दस्ते कल भी भ्रष्टाचार में डूबे हुए थे, आज भी हैं और अभी लंबे समय तक ऐसे ही रहेंगे। सामान्यतः, भ्रष्टाचार का आधार ही व्यक्ति को डराना, प्रताड़ित करना और फिर खसोटना होता है। इसमें कोई सन्देह ही नहीं है कि इस व्यवस्था से यात्रियों को बेशुमार समस्याओं से रूबरू होना पड़ेगा।

यह सत्य है कि कईं यात्री, सामान पर किसी भी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं होने की वजह से अत्यन्त गैर जिम्मेदारी से इतना सामान साथ ले आते हैं कि सहयात्री परेशान हो जाते हैं। परन्तु यह घटना कभी कभार ही होती है। मैने आज तक दर्जनों बार ट्रेन यात्रा की है, परन्तु एक बार भी इस स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा। कुल मिला कर यात्री इस तरह के अतिवादियों से निपट ही लेते हैं। इस संदर्भ में TT को शिकायत मिलने पर कुछ कार्यवाही आदि के अधिकार दिए जा सकते हैं। 

रही बात रेलवे की आय बढ़ने की। निश्चित ही इस तरीके से आय बढ़ाने के लिए पहले काफी खर्च करना पड़ेगा। किराया बढ़ाने का साहस दिखाने की बजाय सरकार परोक्ष साधनों से आय बढ़ाने के प्रयास कर रही है। परन्तु इससे यात्रियों की परेशानियां कईं गुना बढ़ जाएंगी। 

प्रारंभिक तौर पर ऐसा लग रहा है कि सरकार ने विपक्ष को तश्तरी पर रख कर एक मुद्दा भेंट किया है। हालांकि, वर्तमान विपक्ष इतना आत्ममुग्ध और नाकारा है कि पूर्व में भी ऐसे मुद्दों पर उसने कोई रणनीतिक लाभ नहीं उठाए हैं। अभी हाल में घटित इंडिगो का मसला इसका उदाहरण है। जिस घटना की वजह से हजारों लोग बुरी तरह प्रभावित हुए हो उस पर सरकार को कटघरे में खड़ा करने के स्थान पर विपक्ष वोट चोरी जैसे आधारहीन मुद्दों पर ही समय जाया करता रहा। रेल यात्रा जनसंख्या के बहुत बड़े भाग को प्रभावित करती है। यदि इस मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठाया गया तो कोई आश्चर्य नहीं कि मंत्रालय अपने फैसले को वापस लेने पर मजबूर हो जाए। अगले वर्ष के पूर्वार्ध में ही पांच विधानसभाओं के चुनाव होना तय है। इस पृष्ठभूमि में सरकार को बैकफुट पर धकेलना विपक्ष के लिए प्रचार अभियान की एक अच्छी शुरुआत हो सकती है। 

श्रीरंग वासुदेव पेंढारकर 

18/12/2025

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